*१० लकार का अनमोल ज्ञान :-* 🙏
🔸 संस्कृत में काल दश भागों में विभाजित है जिनको दश लकार कहा जाता है :--
०१ ) लट् ---- ल् + अ + ट्
०२ ) लिट् ---- ल् + इ + ट्
०३ ) लुट् ---- ल् + उ + ट्
०४ ) लृट् ---- ल् + ऋ + ट्
०५ ) लेट् ---- ल् + ए + ट्
०६ ) लोट् ---- ल् + ओ + ट्
०७ ) लङ् ---- ल् + अ + ङ्
०८ ) लिङ्---- ल् + इ + ङ्
०९ ) लुङ्---- ल् + उ + ङ्
१० ) लृङ्---- ल् + ऋ + ङ्
🔸 *इनको स्मरण करने की विधी ये है कि :-*
ल् में ( अ इ उ ऋ ए ओ ) क्रम से जोड़ दो । और पहले कर्मों में ( ट् ) जोड़ते जाओ ।
फिर बाद में ( ङ् ) जोड़ते जाओ जब तक कि दश लकार पूरे न हो जाएँ ।
🔸 *इन लकारों के काल ये हैं :-*
(१) *लट् लकार* = वर्तमान काल ।
जैसे :- राम खेलता है।
रामः क्रीडति ।
(२) *लिट्* = अनद्यतन परोक्ष भूतकाल । जो अपने साथ न घटित होकर किसी इतिहास का विषय हो ।
जैसे :-
राम ने रावण को मारा था ।
रामः रावणं जघान,
जघान जघ्नतुः जघ्नुः
जघनिथ जघ्नथुः जघ्न
जघान जघ्निव जघ्निम
(३) *लुट् लकार* = अनद्यतन भविष्यत काल । जो आज का दिन छोड़ कर आगे होनो वाला हो ।
जैसे :-
राम परसों विद्यालय नहीं जायेगा ।
रामः परश्वं विद्यालयं न गन्ता |
गन्ता गन्तारौ गन्तारः
गन्तासि गन्तास्थः गन्तास्थ
गन्तास्मि गन्तास्वः गन्तास्मः
(४) *लृट् लकार* = सामान्य भविष्य काल । जो आने वाले किसी भी समय में होने वाला हो ।
जैसे :-
राम यह कार्य करेगा ।
रामः इदम् कार्यम् करिष्यति।
(५) *लेट् लकार* = यह लकार केवल वेद में प्रयोग होता है ईश्वर के लिए क्योंकि वह किसी काल में बंधा नहीं है ।
(६) *लोट् लकार* = ये लकार आज्ञा, अनुमति लेना, प्रशंसा करना, प्रार्थना आदि में प्रयोग होता है ।
जैसे :- आप जाओ -भवान् आगच्छतु , वह खेले -सः क्रीडतु , तुम खाओ - त्वं खाद , क्या मैं बोलूँ -किम् अहं वदानि ?
(७) *लङ् लकार* = अनद्यतन भूत काल । आज का दिन छोड़ कर किसी अन्य दिन जो हुआ हो ।
जैसे :-
आपने उस दिन भोजन पकाया था - भवान् तस्मिन् दिने भोजनं अपचत् ।
(८) *लिङ् लकार* = इसमें दो प्रकार के लकार होते हैं :--
*आशीर्लिङ्*= किसी को आशिर्वाद देना हो ।
जैसे :-
आप जीओ - भवान् जीवेत्।
तुम सुखी रहो।त्वं सुखी भव । आदि
*विधिलिङ्* = किसी को विधी बतानी हो ।
जैसे :-
आपको पढ़ना चाहिए - भवान् भठेत्।
मुझे जाना चाहिए - अहं गच्छेयम् ।
आदि ।
(९) *लुङ् लकार* = सामान्य भूत काल । जो कभी भी बीत चुका हो ।
जैसे :-
*उसने खाना खाया - सः भोजनं अखादीत् ।*
(१०) *लृङ् लकार* = ऐसा भूत काल जिसका प्रभाव वर्तमान तक हो । जब किसी क्रिया की असिद्धी हो गई हो ।
जैसे :-
यदि वह पढ़ता तो विद्वान बनता । -
यदि सः अपठिष्यत् तु विद्वान् अभविष्यत्।
इन्हीं लकारों में सभी धातुरूप चलते हैं ।
*🚩जयतु संस्कृतम् ।। जयतु भारतम् ।। जयतु आर्यावर्तम् ।।🚩*